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गीत प्रीत के ...........

Posted On: 7 Apr, 2015 Others,कविता,Hindi Sahitya में

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मुक्त ह्रदय से
मुक्त कंठ में
जब तुमसे बतियाता हूँ मैं ,
तुम कहते हो
भाव विह्वल हो
गीत प्रीत के गाता हूँ मैं i
तेरा जीना मेरा जीना
मेरी गर्दन तेरा सीना ,
एक हुए जब भाव विह्वल हो
हर्ष हर्ष हर्षाता हूँ मैं i
हे मेरे मन मीत बताओ
कैसे गुजरें दिन ये रातें ,
ख्वाबों की बगिया मैं ठहरीं
अरमानों की ढेर बरातें ,
आँख लगी औ मिटीं दूरियां
स्वांस स्वांस इतराता हूँ मैं i
कवि का जीवन
स्वप्न लोक में
जागना जीना उतराना ,
हे अनंत !
तुममें थिर रह कर
प्रभा लोक में रम जाना ,
तुमसा होगा कौन
ये कह कह
क्यों पल पल पागलता हूँ मैं i

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 7, 2015

श्री भोला नाथ जी बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता ‘ क्यों पलपल पगलाता हूँ मैं प्रेम ही प्रेम हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है डॉ शोभा

bhagwandassmendiratta के द्वारा
April 7, 2015

कैसे गुजरें दिन ये रातें ,ख्वाबों की बगिया मैं ठहरीं अरमानों की ढेर बरातें , आदरणीय भोला नाथ जी, अपने इष्ट के प्रति प्रेम प्रीत से सराबोर ये कविता सचमुच पाठक को आनंद रस में डुबो दे रही है| बहुत बहुत बधाई|

jlsingh के द्वारा
April 12, 2015

मुक्त ह्रदय से मुक्त कंठ में जब तुमसे बतियाता हूँ मैं , आदरणीय भोला नाथ जी, मुक्त कंठ से कोकिल बोली, कानों में मिश्री सी घोली अगर नहीं तब भी जग पाया खीज भरा दिन पाता हूँ योंन ही मेरे मन से उदगार छलक पड़े. सादर!

Bhola nath Pal के द्वारा
April 13, 2015

आदरणीय डॉ शोभा जी! आप ठीक कहती हैं कि प्रेम की कोई सीमा नहीं है |

Bhola nath Pal के द्वारा
April 13, 2015

आदरणीय भगवान दास जी! सकारात्मक उत्साहवर्धन के लिए आभार |

Bhola nath Pal के द्वारा
April 13, 2015

श्री सिंह साहब ! हाथ में हाथ डाल, कुछ कदम साथ चलना आप का, उल्लास से, सुख से भर जाता है मुझे |

sudhajaiswal के द्वारा
April 13, 2015

बहुत सुन्दर रचना

Bhola nath Pal के द्वारा
April 16, 2015

सुधा जी, ब्लॉग से जुड़ने तथा सकरात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद |

Starleigh के द्वारा
October 17, 2016

What a joy to find soenmoe else who thinks this way.


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