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सोचो, शायद निकले कोई बहाना...

Posted On: 15 Jan, 2016 Others,कविता,Hindi Sahitya में

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कुछ संग्रह करो
उसने कहा
बुढ़ापे के लिए
हारी बीमारी के लिए
पैसा होगा , सब साथ देंगे,
सेवा होगी .
पास बैठा मैं
कुछ गुन रहा था,
अंदर ही अंदर
न जाने क्यों
क्या धुन रहा था,
क्या पैसे वाले -
कष्ट नहीं पाते ?
बिना कष्ट ही;
शरीर छोड़ जाते ?
और…..
मैं और अंदर घुसा
कष्ट का इलाज क्या है,
हम भाग रहे हैं
जंगल से गांव की ओर,
गांव से घर की ओर,
घर से तहखाने की ओर,
तहखाने में कोने की ओर,
और अंत में –
आँखे बंद, हाथ उठाये
समर्पण .
गरीब कहता है
मैं मरा,
अमीर कहता
मुझे बचाओ,
दर्शक बनी दुनिया
सोचती रह जाती
क्या करूँ ?
अकेलेपन से
जीवन भर लड़े हैं,
भागे हैं भीड़ की ओर
अंत में ….
अकेले जाना है,
सबने माना है,
कष्ट ..
साधनो से , सुरक्षा से
क्या कम होगा ?
अंतिम पीड़ा तो
सबकी समान है,
सबको सहना है,
कौन कहता है
मैं बिना कष्ट मर पाया,
बिना कष्ट
जीवन सागर
खुशी खुशी तर पाया,
सोचो !
शायद ,निकले कोई बहाना,
संभव हो सके
अंतिम यात्रा पर
खुशी खुशी निकल पाना l

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
January 19, 2016

श्री भोला नाथ जी क्या पैसे वाले – कष्ट नहीं पाते ? बिना कष्ट ही; शरीर छोड़ जाते ?संपूर्ण कविता ही वास्तविकता के धरातल पर लिखी गयी है यदि हार्ट अटैक से क्षण भर कोई चला गया जैसे मेरे पिता कष्ट होता हैं हम सब कुछ उनके लिए कुछ नही कर पाए मन भर आया जाने का अहसास होने लगा वास्तव में जीवन क्षण भंगुर है

Bhola nath Pal के द्वारा
January 22, 2016

आदरणीय डॉ शोभा जी !सदियों से खोज जारी है शायद संभव हो ख़ुशी ख़ुशी सरीर बदल पाना .वह दिन कितना सुखद होगा .प्रतिक्रिया का स्वागत .सादर…..


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