गहरे पानी पैठ

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क्या पागल पाषाण ? लगे उतराने....

Posted On: 22 Apr, 2016 कविता,Junction Forum,Hindi Sahitya में

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कोई कुछ भी कहता घूमे
माने या न माने
दर्पण झूठ कभी न बोले
कहते लोग सयाने i
*************************
दर्पण दर्प दिखाता क्यों
मेरा मैं बनजाता क्यों
मेरे प्रयास क्या बचकाने ?
***************************
चारों ओर बबूल जम रहे
कांटा बन कर रोज चुभ रहे
तुम फिर भी अनजाने i
************************
बचपन बीता गई जवानी
वानप्रस्थ भी हुआ कहानी
चौथे पन में नव विकास के
सुनते कान तराने i
**********************
सच्ची बात खटकती है
ये सब ही जाने
रावण की विद्वता
राम भी पहचाने
क्या पागल पाषाण ?
लगे उतराने………..
*******************

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 22, 2016

श्री भोला नाथ जी सुंदर कविता यह भाग ” ये सब ही जाने रावण की विद्वता राम भी पहचाने क्या पागल पाषाण ? लगे उतराने………..” अति सुंदर

Bhola nath Pal के द्वारा
April 23, 2016

आदरणीय डॉ शोभा जी ! सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभार ……

sadguruji के द्वारा
April 23, 2016

कोई कुछ भी कहता घूमे माने या न माने दर्पण झूठ कभी न बोले कहते लोग सयाने i आदरणीय भोलानाथ पाल जी ! सच कहा आपने ! सुन्दर और सारगर्भित रचना की प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन ! ये पंक्तियाँ भी बहुत अच्छी हैं ! बचपन बीता गई जवानी वानप्रस्थ भी हुआ कहानी चौथे पन में नव विकास के सुनते कान तराने i

Bhola nath Pal के द्वारा
April 24, 2016

आदरणीय सद गुरु जी ! यही है वर्तमान भारत की तस्वीर .सदर ……….

Deandra के द्वारा
October 17, 2016

Too many cotmlipenms too little space, thanks!


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