गहरे पानी पैठ

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शर्मिंदा हुए नेत्र ...............

Posted On: 16 Nov, 2016 कविता,Junction Forum,Hindi Sahitya में

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हे नेत्र !
तुम न होते-
तो….
कैसे देख पाता
ये जमाना-
कि……
कभी कभी
कैसे छला जाता है-
समय,
विवेक शून्य
विरोध के हाथों I
***********************
समय के विरुद्ध
एकजुट होतीं-
दुरभि सन्धियाँ,
झेल रही हैं
लौ बुझने से-
पूर्व की
छटपटाहट I
************************
पतन के प्रेत
कर रहे हैं
निर्विकार नैतिकता को
निर्वस्त्र
ठगी अस्मिता
देख रही है
स्वयं को-
अनावृत होते I
**********************
रात……..
कितनी भी -
काली हो
घनी हो, अंधियारी हो
प्रभा की हर किरण
करती है,
निशा के-
कुत्सित हृदय को-
विदीर्ण I
उदय होता है
केसरिया प्रभात,
हर बेला….
बन जाती है
अमृत बेला,
समय का-
होता है श्रृंगार,
साक्षी दिशाएं
करती हैं-
अमृतपान,
आलोक में स्नान I
************************
अनंत विस्तार का
नियमन करती-
सास्वत चेतना
के आगे-
मानसिक प्रदूषण के
ये पुतले,
जितना उछलेंगे
अशक्त होंगे I
*******************

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
November 22, 2016

श्री आदरणीय भोला नाथ जी अति सुंदर कविता आपकी अन्य कविताओं की भांति ही मधुर अनंत विस्तार का नियमन करती- सास्वत चेतना के आगे- मानसिक प्रदूषण के ये पुतले, जितना उछलेंगे अशक्त होंगे | सुंदर विचार

Bhola nath Pal के द्वारा
November 23, 2016

aadrniy doc shobha ji !sadar aabhar ……………


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