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अंतस की यातना का यह भीषण युद्ध ..........

Posted On: 15 Feb, 2017 Social Issues में

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और ….
समरसता को छलने
फिर –
एक जुट हुए
स्वार्थ के प्रेत,
अल्पता, रिक्तता
करनें चले
समग्रता पर
अधिकार,
दुरभि संधियां
खेलनें लगीं
गलबहियां का -
ब्यापार .
.
बुद्ध ,
फिर हुए
अपनी छाया से,
छाया की -
कलुषित माया से-
भयभीत,
भिक्षा पात्र
अपमानित हुआ,
झेलने लगा,
फिर ,
नंगी तलबार की-
प्रीत .
कब तक?
आखिर कब तक?
झेलें गे बुद्ध
अंतस की
यातना का
यह भीषण युद्ध ?
************

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
February 15, 2017

आदरणीय सर जी सादर नमस्कार सुन्दर भाव और खूबसूरत शब्द चयन में रची बसी कविता के लिए आभार

Shobha के द्वारा
February 19, 2017

श्री भोला नाथ जी बड़ी खूबसूरती से लिखी कविता


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