गहरे पानी पैठ

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अब लौटूं गा ............

Posted On: 10 Apr, 2017 Social Issues में

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तब….
लगता था
कुछ करने को है
साँझ ,
जल्दी ढलने को है
तब ….
मन के घोड़े
रात पर-
खीझते थे
किन्तु ,
सूरज जितना जोतता
उतने-
रीझते थे
दिमागी उठा पटक
तब काम थी
अधिक थकना ही
आराम थी
एक उमंग थी
जो –
सबको
सुखद स्पर्श देती थी
सहलाती थी
सारी थकान हर लेती थी
गंवार -
तब कवित्त पढ़ते
न थकते थे
बूढ़े -
“विजयी भवः” कहते,
श्रम हरते थे
हवा -
प्राण वायु लगती थी
स्वासों में
उत्शाह भरती थी
जैसे हाथ पकड़
उड़ानें को उद्यत
अदृश्य -
किन्तु अवगत .
.
आज फिर ….
गांव में हूँ .
सभी साथी हैं
बच्चे हैं, युवा हैं
बड़े हैं
पर
सभी सच्चे हैं
सभी उत्सुक हैं
हँसतीं आँखें
क्या बोले !
मुस्कुराये जा रहीं हैं
क्या कहूं,
संकल्प लिया था इनसे ,
“बेकार नहीं घूमोगे ”
कुछ दिन रुकने की इच्छा थी
अब लौटूं गा
आश्वासन देकर …….
“तिरी पर बहिश्त नहीं उगता,
सब्र करो,
सब कुछ होगा ”
**********************
भोला नाथ पाल ग्राम व् पोस्ट पूरा राय जनपद कन्नौज, उत्तर प्रदेश, mob .no .9410221594
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